दुर्गासूक्तम् | Durga Suktam | दुर्गा सूक्तम्


ॐ जातवेदसे सुनवाम सोम मरातीयतो निदहाति वेदः ।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरिताऽत्यग्निः ॥ १॥

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ।
दुर्गां देवीꣳ शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ २॥

अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्थ्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा ।
पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शंयोः ॥ ३॥

विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुन्न नावा दुरिताऽतिपर्षि ।
अग्ने अत्रिवन्मनसा गृणानोऽस्माकं बोध्यविता तनूनाम् ॥ ४॥

पृतना जितꣳ सहमानमुग्रमग्निꣳ हुवेम परमाथ्सधस्थात् ।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद्देवो अति दुरितात्यग्निः ॥ ५॥

प्रत्नोषि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सथ्सि ।
स्वाञ्चाग्ने तनुवं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमायजस्व ॥ ६॥

गोभिर्जुष्टमयुजो निषिक्तन्तवेन्द्र विष्णोरनुसंचरेम ।
नाकस्य पृष्ठमभि संवसानो वैष्णवीं लोक इह मादयन्ताम् ॥ ७॥

ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि ।
तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ॥

॥ इति दुर्गा सूक्तम् ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


अन्य सूक्तम् संग्रह


श्री सांपुटिक श्री सूक्त | Shree Samputik Shree Suktam
अग्नि सूक्तम् | Agni suktam
नारायण सूक्तम्  | Narayan Suktam
श्री लक्ष्मी सुक्तम् | श्री सूक्तम्  | Sri Lakshmi Suktam
लक्ष्मी सुक्तम् | Laxmi Suktam
पुरुष सूक्तम् | Purush Suktam

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *